अधिगम का अन्तर्दृष्टि सिद्धांत

 अधिगम  का अन्तर्दृष्टि सिद्धांत इस सिद्धांत का प्रतिपादन गैस्टाल्ट संप्रदाय द्वारा किया गया। इसके प्रवर्तक कोहलर, कोफ्का तथा मैक्स वर्दीमर हैं।  अंतर्दृष्टि सिद्धांत को सूझ का सिद्धांत भी कहा जाता है। कोहलर के अनुसार अधिगम किसी अभ्यास से नहीं बल्कि अचानक होता है ,इसलिए इस संज्ञानात्मक अधिगम पर आधारित भी कहा जाता है। क्योंकि सीखने वाला व्यक्ति किसी क्रिया को न करके अपनी समझ के माध्यम से सीखता है। कोहलर ने सुल्तान नाम के एक वनमानुष पर प्रयोग किया ,इस पयोग में वनमानुष को एक पिंजरे में बंद कर दिया गया और भोजन को उसकी पहुंच से दूर पिंजरे के बहार रख दिया गया। साथ ही उस पिंजरे में कुछ छड़ें और बॉक्स भी रख दिए। वनमानुष कुछ देर तो ऐसे हो घूमता रहा किन्तु कुछ समय बीतने के पश्चात अचानक उसे उपाय सूझा। उसने उन छड़ों का प्रयोग करके और बॉक्स पर चढ़कर उन केलों को उतार लिया। इस प्रयोग में बताया गया है कि समस्या का समाधान अचानक ही हुआ है जो यह स्पष्ट  करता है कि अधिगम सूझ के माध्यम से होता है साथ ही इसमें वनमानुष द्वारा सम्पूर्ण परिस्थिति का अवलोकन करके उस परिस्थिति में स्थित सामग्री का प्रयोग किया गया इसलिए उन्होंने इसे समग्राकृति का सिद्धांत भी कहा है। 

अंतर्दृष्टि सिद्धांत का शिक्षा में अनुप्रयोग -

१. शिक्षण अधिगम को प्रभावी बनाने के लिए शिक्षक को उपयुक्त शिक्षण विधियों , प्रविधियों एवं सहायक सामग्री द्वारा छात्रों के समक्ष विषय वस्तु  की स्थिति स्पष्ट करनी चाहियें।  

२. विद्यार्थियों द्वारा अपनी अंतर्दृष्टि के प्रयोग के लिए शिक्षक को अधिगम के तीनों स्तरों (स्मृति ,अवबोध ,चिंतन )के अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करना चाहियें।  

३. छात्रों के समक्ष लक्ष्यों को स्पष्ट करना चाहिए।  

४. अधिगम का एक निश्चित क्रम हो जिसमे अधिगम प्रक्रिया सरल से कठिन की और अग्रसर हो।  

५. विद्यार्थी के पूर्वानुभव अधिगम में सहायक होते हैं।  

६. शिक्षक द्वारा विषयवस्तु का सामान्यीकरण किया जाना चाहिए जिससे नवीन समस्याओं का समाधान करने में सहायता मिले। 

७. छात्रों में स्वक्रिया की प्रवृति को प्रोत्साहन देना चाहिए। 

सूझ के सिद्धांत का शिक्षा में महत्व -यह सिद्धांत रचनात्मक कार्यों के लिए उपयोगी है। यह बालकों की बुद्धि ,कल्पना और तर्क शक्ति को बढ़ाता है।  स्किनर के अनुसार -यह सिद्धांत आदत व् सीखने के यांत्रिक स्वरुप को कम करता है। यह बालक में स्वयं कार्य करने की प्रेरणा देता है। 

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